Thursday, October 30, 2014

काला धन पे शोर शराबा है बहुत.................



वो भी अमृत-सा नज़र आयेगा जो विष होगा। 

हरिक जिरह पे कभी दैट कभी दिस होगा। 

मसला-ए-काला धन पे शोर शराबा है बहुत,

अन्त में देखना सब टाँय टाँय फिश होगा। 

-कुँवर कुसुमेश

9 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (31.10.2014) को "धैर्य और सहनशीलता" (चर्चा अंक-1783)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. हमेशा यही होता आया है … सटीक लेखन

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  3. हम तो उम्मीद लगाए बैठे हैं ... १५ लाख एकाउंट में आएगा ...

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  4. very nice.

    http://hindikavitamanch.blogspot.in/

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  5. बिसात वही है मोहरे भी वहीं हैं और खिला्डी भी.सब सबकी जानते हैं बस हम ही नहीं समझ पाते हैं.

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  6. मतलब अपने भी लाखों डूब गए !

    हिंदी फोरम

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  7. बहुत सुन्दर...उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

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